अपने मन का रावण मारें, यही आज पैगाम।

-गिरीश पंकज-

बहुत हो गया ऊंचा रावण, बौना होता राम।
मेरे देश की उत्‍सव-प्रेमी जनता तुझे प्रणाम।।

नाचो गाओ मौज मनाओ कहां जा रहा देश
मत सोचो काहे की चिंता व्‍यर्थ न पालो क्‍लेश
हर बस्‍ती में है इक रावण, उसी का है अब नाम।

नैतिकता-सीता बेचारी, करती चीख पुकार
देखो मुझे हर लिया, अबला हूं लाचार
पश्चिम का रावण हंसता है अब तो सुबहो शाम।

राम-राज इक सपना है पर देख रहे हैं आज
नेता, अफसर, पुलिस सभी का फैला गुंडाराज
डान, माफिया, रावण-सुत बन करते काम तमाम।

महंगाई की सुरसा प्रतिदिन निगल रही सुख-चैन
लूट रहे हैं व्‍यापारी सब, रोते निर्धन नैन
दो पाटन के बीच पिस रहा अब गरीब हे राम।

बहुत बढा है कद रावण का, हो ऊंचा अब राम
तभी देश के कष्‍ट मिटेंगे, पाएंगे सुख-धाम
अपने मन का रावण मारें, यही आज पैगाम।
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भ्रष्‍टाचार आज बैठा है सिर पर ताज धरे।

-डॉ0 ओमप्रकाश सिंह -

भ्रष्‍टाचार आज बैठा है
सिर पर ताज धरे।

कई हजारे
अन्‍ना चीखें
रामदेव चिल्‍लायें
गांधीवादी
हथियारों से
लड़ने को मुंह बायें
अनुत्‍तरित प्रश्‍नों के आगे
पथ पर गाज गिरे।

चटक रहीं
सीमाएं मन की
क्षुब्धित है परिवेश
सच के द्वार
झूठ बैठा है
लगती संधि ि‍वशेष
संशय की
खिडकी से कोई
क्‍या अंदाज करे।

संकल्‍पों के
हरित खेत में
गिरी हुई फसलें
पथराये
घर के आंगन से
बदल रही नस्‍लें
टूटे मन पर
गांठ पड़ गई
कौन इलाज करे।
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आज द्रौपदी नग्न हो रही भीड़ भरे चौराहों पर...

वह आजादी कहाँ मिली?
रजनीकांत शुक्ल

जैसी तुम कहते थे साथी, वह आजादी कहाँ मिली?
जनगण के मन की अभिलाषा, आखिर जाकर कहाँ फली?

आज द्रौपदी नग्न हो रही भीड़ भरे चौराहों पर,
तोड़े जंघा दुर्योधन की, कहाँ भीम से महाबली?

बीते दशक मगर अब तक, जंजीर होंठ पर भाषा की,
राष्ट्र अभी तक मूक, राष्ट्र को अपनी वाणी कहाँ मिली?

मेहनत अगर बराबर तो मेहनत का दाम बराबर है,
अधिकारों का यह बंटवारा, जहाँ मिले वह कौन गली?

रावण को तो मारा हमने, पर लौट केघर में हार गए,
एक बार संस्कृरति की सीता फिर अपनों से गई छली।

उन राहों का देख हश्र हम उन पर ही बढ़ते जाते,
अहं प्रश्न है आज यह सोचें, क्या शिक्षा का अर्थ यही?

Keywords: Rajnikant Shukla, Hindi Ghazal, Hindi Kavita, Hindi Poetry, Samyik Kavita, Indian Poetry, Modern Poetry

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एक सदी शोषण की जी ली...

एक सदी शोषण की जी ली...
-रामेन्‍द्र त्रिपाठी

एक सदी शोषण की जी ली, अगली फिर जीनी है डर की।
दोहरे मापदण्‍ड जीवन के, फूल गाँव के, गंध नगर की।।

चक्रवृद्धि का ब्‍याज चुकाकर सचमुच सस्‍ते छूटे,
बाहर बाहर ही हम साबुत, भीतर-भीतर टूटे।
वैसे ही फिर याद आ गई, अपने कच्‍चे घर की।।

झूठे धनुष, बाण सब झूठे, लक्ष्‍य भेद क्‍या जानें,
भौतिकता में खो बैठे हैं, हम अपनी पहचानें।
सच तो यह है चिन्‍ता है बस सबको आज उदर की।।

महारथी अभिमन्‍यु वध तक सीमित हैं बेचारे,
कैसे जिये परीक्षित इसकी सोचे कौन विचारे।
अंधियारे ने काली कर दी चादर है खद्दर की।।

Keywords: Ramendra Tripathi, Kavita, Geet, Hindi Poetry, Geetkar, Hindi Poet, Modern Hindi Poet, Adhunik Kavita
Post Written by +DrZakir Ali Rajnish
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जागो पहरेदार, लुटेरे आए हैं...


लुटेरे आए हैं...
-रजनीकांत शुक्‍ल

जागो पहरेदार, लुटेरे आए हैं।
हाथ करो हथियार, लुटेरे आए हैं।

बहुत सो लिए कुंभकर की निद्रा में,
अब न करो तुम प्‍यार लुटेरे आए हैं।

दो रंगा है खून, दोमुंही बातें हैं,
बनकर रंगे सियार, लुटेरे आए हैं।

मौसम में दलाव, बदौलत इनकी है,
फाश हो रहे राज, लुटेरे आए हैं।

राणा का भाला, झांसी की रानी की,
कहां गई तलवार, लुटेरे आए हैं।

पूजे जाते कांटे, फूल सिसकते हैं,
बदली चमन बहार, लुटेरे आए हैं।

हालात बदतर हुई, एक ही कारण है,
माफ किया हर बार, लुटेरे आए हैं।

बूढ़ा मर्द, जवां, बच्‍चा, औरत कोई,
खून इन्‍हें दरकार, लुटेरे आए हैं।

आजानों की सदा, वेद पाठों की गूंज,
बदल गई झंकार, लुटेरे आए हैं।

ऊधम की पिस्‍तौल, भगत का बम कहां,
गिद्ध बने सरदार, लुटेरे आए हैं।

Keywords: Rajnikant Shukla, Ghazal, Hindi Kavita, ग़ज़ल,
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